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मुसाफ़िर कल भी था मुसाफ़िर आज भी हूँ,कल अपनों की तलाश में था आज अपनी तलाश मैं हूँ!
प्यार हम दोनों ने किया मगर तड़पना सिर्फ मेरे नसीब
दुःख छुपाने के कमाल को हसी कहते
तुम कहा हो मेरे करीब आओ, मैं कहा हु मुझे पता तो चले..!!!
ज़रा सी वक़्त ने करवट क्या ली, गैरों की लाइन में सबसे आगे अपनों को पाया हमने!
दुःख तुमने मुझे नहीं दिया है मैंने अपने आप को
ज़िन्दगी में एक हसी वो होती है जो इंसान अपने ग़म को छुपाने के लिए खुद सीखता है
जब प्यार करने वाले अपने जज़्बातों को दबाकर रिश्तों को कोई दूसरा नाम देते है
हम हार गए क्योंकि हमने खुद से कहा कि हम
छोटी सी जिंदगी है, हँस के जियो, भुला के गम सारे दिल से जियो, अपने लिए न सही अपनों के लिए