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कोई सिखादे मुझे भी अपने वादों से मुक़र जाना ! बहुत थक चुका हूँ निभाते-निभाते.
ज़िन्दगी में कुछ ज़ख्म ऐसे होते है जो कभी नहीं भरते बस इंसान उन्हें छुपाने का हुनर सीख जाता है
ज़िन्दगी तेरे भी कितने नखरे है, एक दिन हँसाकर महीनों रुलाती है।
ज़िन्दगी के बहुत से इम्तिहान बाकी हैं अभी तो बस चलना सीखा है नापने को पूरी कायनात बाकी है। गिरूंगा सीखूंगा उठूंगा अभी सीखने को पूरा संसार बाकी है।
यादें ही तो ज़िन्दगी का खज़ाना हैं. बाकी तो सबको खली हाथ ही जाना हैं…
ज़िन्दगी पल-पल ढलती है, जैसे रेत मुठ्ठी से फिसलती है कुछ खोकर पछताना क्यों, ज़िंदगी जैसी भी है बस एक ही बार मिलती है
हसने वालो के साथ तो दुनिया हसती है लेकिन रोने वाला अकेले ही
मैं ज़िन्दगी से नहीं, अपने आप से नाराज़ हूँ – अर्जुन
दुःख तुमने मुझे नहीं दिया है, मैंने अपने आप को दुःख दिया है.
जो उम्मीद दूसरों से करते हो वो खुद से करो और ज़िन्दगी की नई शुरुआत करो।