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मैं ज़िन्दगी से नहीं, अपने आप से नाराज़ हूँ – अर्जुन
दूसरो के लिए कभी अपने उसूलों के साथ समझौता न कीजिए अपने आत्मसम्मान की रक्षा खुद कीजिए !
कोई सिखादे मुझे भी अपने वादों से मुक़र जाना ! बहुत थक चुका हूँ निभाते-निभाते.
कितना अजीब भ्रम है ये मानना कि सुन्दरता
इस दिन हर कोई अपने पिता को स्पेशल फील करवाना चाहता
आंखें खुली रखो तो आंसूं भी काले और बंद करू तो सपने भी
हर दुःख आने वाले सुख की चिठ्ठी होती है, और हर नुक्सान होने वाले फायदे का
हम आने वाले ग़म को खिंचतान कर आज की ख़ुशी पे ले आते है, और उस ख़ुशी में ज़हर घोल
हसने वालो के साथ तो दुनिया हसती है लेकिन रोने वाला अकेले ही
जिसका दिल ग़म की तन्हाइयों में उजड़ गया हो, वो बाहर से कितना ही सेहतमंद लगता हो