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बड़ी अजीब होती है ये यादें, कभी हसा देती है, कभी रुला देती है
मैं ज़िन्दगी से नहीं अपने आप से नाराज़
हसने वालो के साथ तो दुनिया हसती है लेकिन रोने वाला अकेले ही
जिंदगी कैसे अजीब हो गई हैं, खुश दिखना खुश होने से ज्यादा जरुरी हो गया हैं.
मनुष्य कितना भी गोरा क्यों ना हो परंतु उसकी परछाई सदैव काली होती है…!! “मैं श्रेष्ठ हूँ” यह आत्मविश्वास है लेकिन…. “सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ हूँ” यह अहंकार है
कितने अजीब हैं ये जमाने के लोग, खिलौना छोड़ कर जज़बातों से खेलते है।
लोग शादी करते हैं क्योंकि वे प्राकृतिक शक्तियों का प्रतिरोध नहीं कर पाते, हालांकि उनमें से बहुत से लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि वे संभवत
जिसका दिल ग़म की तन्हाइयों में उजड़ गया हो, वो बाहर से कितना ही सेहतमंद लगता हो
अजीब तरह के लोग है इस दुनिया में, अगरबत्ती भगवान के लिए खरीदते है और खुशबू अपने पसंद की तय करते हैं।
दुख तो मुफ्त में मिलते है लेकिन सुख की कीमत तो देनी ही