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कभी भी शादियों के भोजन की बुराई मत करना, कोई पिता वर्षो कमाता है एक दिन की दावत के लिए।

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सारी उम्र गुज़री यूं ही रिश्तों की तुरपाई में, मन के रिश्ते पक्के निकले, बाकि उधड़ गए कच्ची सिलाई में
खुद पर भरोसा करने का हुनर सीख लो. सहारे कितने भी भरोसेमंद हो, एक दिन साथ छोड़ ही जाते है!
क्रोध हमेशा मूर्खता से शुरू होकर पश्चाताप पर समाप्त होता है।
हमारे बिग ब्रदर पहले दोस्त एवं दूसरे पिता
हजारों ख़्वाब टूटते हैं, तब कहीं एक सुबह होती है.
जब इंसान की जरूरत बदल जाती है तो उसका आपसे बात करने का तरीका भी बदल जाता है।
पिता और बेटी पर हिंदी में शायरी
बहुत दुर तक जाना पड़ता है सिर्फ यह जानने के लिए..कि नज़दीक कौन है
गुरुर किस बात का साहब, आज मिट्टी के उपर, तो कल मिट्टी के निचे
एक भाई पिता-माता का भी रोल अदा करता है।