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छुपा रहा हूं इश्क अभी सबसे पर एक दिन सरेआम तुम्हें लेने आऊंगा

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अब बात नफरत की है तो नफरत ही सही।
जैसे कभी जानते ही नहीं थे
निपुणता हमेशा आपके आसपास के लोगों के प्रति आपके प्रेम और परवाह का नतीजा होनी चाहिए - न कि एक मशीनी और उदासीन कार्य-भावना का।
तेरी एक मुस्कान से सुधर गयी तबियत मेरी, बताओ यार इश्क करते हो या इलाज करते हो!
मैं बिन फेरों के भी रिश्ता निभाऊंगा बश तुम मेरा हाथ थामें रखना
थोड़ा डुबूंगा, मगर मैं फिर तैर आऊंगा, ऐ ज़िंदगी, तू देख, मैं फिर जीत जाऊंगा
तुम नफरत का धरना
अब वो नफरत में बदल गयी है।
मैं प्यार का इस्तीफा
मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे