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मगर लोग मोहब्बत का सुबूत ज़रूर मांगते है।
तुम नफरत का धरना
जैसे कभी जानते ही नहीं थे
तुम से जो मोहबत थी ना,
ज़िंदगी की चंद लम्हों में छुपा है सुकून, खुद को खोया है तो ज़िंदगी को भी खो गए हैं, खुद से मिलते हुए ही समझेंगे ज़िंदगी को, यही है ज़िंदगी का असली मज़ा।
जैसे प्यार को मानते ही नहीं थे।
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
चाहे जितना भी टाइम लग जाए पर मुझे इस जिंदगी में सिर्फ तू ही चाहिए
सात फेरों से तो, महज शरीर पर हक मिलते हैं, आत्मा में हक तो रूह के फेरों से मिलते हैं !
यहाँ तो लोग नफरत भी करते है प्यार की तरह।