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ऐ दोस्त तुझ को रहम न आए तो क्या करूँ दुश्मन भी मेरे हाल पे अब आब-दीदा

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मित्र और दुश्मन, दोनों ही जरूरी हैं; एक जीने के लिए, दूसरा जीने का कारण बताने के लिए।
भूल शायद बहुत बड़ी कर ली दिल ने दुनिया से दोस्ती कर
ऐ दोस्त तुझ को रहम न आए तो क्या करूँ दुश्मन भी मेरे हाल पे अब आब-दीदा है
दोस्त दो-चार निकलते हैं कहीं लाखों में जितने होते हैं सिवा उतने ही कम होते
अक़्ल कहती है दोबारा आज़माना जहल है दिल ये कहता है फ़रेब-ए-दोस्त खाते
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार
दुश्मन से ज्यादा खतरनाक वो है, जो दोस्त बनकर धोका देते
दुश्मन से ज्यादा खतरनाक वो है, जो दोस्त बनकर धोका देते है।
दुश्मन भी कांपने लगता है, जब भाई सामने होता है।
आ गया ‘जौहर’ अजब उल्टा ज़माना क्या कहें दोस्त वो करते हैं बातें जो अदू करते