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पत्थर अगर कीचड़ में मरोगे तो कीचड़ आपको ही लगेगा ।
व्यक्ति कर्मों में जीता है वर्षों में नहीं
हर किसी से महत्व पाने की इच्छा व्यक्ति को “नुकसान” पहुंचाती है.
“जब गलती अपनी हो तो हमसे बडा कोई वकील नही जब गलती दूसरो की हो तो हमसे बडा कोई जज नही
किसी की बुराई करने से आपका चरित्र पता चलता है ना की उस व्यक्ति का।
स्वाभिमान मान्यता की एक अवस्था है कि एक व्यक्ति उतना ही महत्वपूर्ण और योग्य है जितना कि कोई अन्य इंसान।
जिस व्यक्ति का लालच खत्म, उसकी तरक्की भी खत्म.
ईश्वर से कोई भी प्रेम कर सकता है क्योंकि वह आपसे कुछ नहीं मांगता। पर अपने पास खड़े व्यक्ति से प्रेम करने की कीमत जीवन से चुकानी पड़ती है ।
हर जंग लड़ने लायक नहीं होती और हर जीत जश्न मनाने लायक नहीं होती क्योंकि हर असहमत इंसान को दुश्मन नहीं बनाना चाहिए।
विफलता के साथ ही आगे के नये दरवाज़े खुलते है ।