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पीठ हमेशा मजबूत रखनी चाहिए, क्योंकि शाबाशी और धोखा दोनों पीठ के पीछे ही मिलते है.
मैंने कुछ वक्त चुप रहकर भी देख लिया, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता
तेरी यादों के सहारे जीना सिख लिया है, सिरहाने के तकिया का सहारा लिया है
ख़ुशी, शांति और प्रेम–ये कोई आध्यात्मिक लक्ष्य नहीं हैं। यह सब तो समझदारीपूर्वक जीने की शुरुआत है।
दर्द कम नहीं हुआ है मेरा ! बस सहने की आदत हो गयी है !!
उदास कर जाती है मुझे हर रोज ये शाम, ऐसा लगता है जैसे कोई भुला रहा है धीरे धीरे
तेरा इंतजार करता हूँ रोज रातों में, खुद को सांसों में समेटा हुआ देखता हूँ
हम सभी को दो में से एक दर्द से पीड़ित होना चाहिए अनुशासन का दर्द या पछतावे का दर्द। अंतर यह है कि अनुशासन का वज़न ज़्यादा होता है जबकि अफसोस का वज़न बहुत ज़्यादा होता है।
दर्द की दवा न हो तो दर्द को ही दवा समझ
गुजर जाएगा ये दौर भी ज़रा सा सब्र तो रख, जब खुशियों ही नहीं रुकी तो गम की क्या औकात है