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हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था, मेरी किश्ती थी डूबी वहां, जहाँ पानी कम था…

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हम आने वाले ग़म को खिंचतान कर आज की ख़ुशी पे ले आते है, और उस ख़ुशी में ज़हर घोल देते है… – आनंद
ताश का जोकर, और अपनों की ठोकर, अक्सर वाजी पलट देते है।
जब प्यार करने वाले अपने जज़्बातों को दबाकर, रिश्तों को कोई दूसरा नाम देते है, तो कभी न कभी, कहीं न कहीं जज्बातों फूट फूटके रोने लगते है
छोटी सी जिंदगी है, हँस के जियो, भुला के गम सारे दिल से जियो, अपने लिए न सही अपनों के लिए जियो।
सिर्फ खड़े होकर पानी देखने से आप नदी नहीं पार कर सकते.
हर दुःख आने वाले सुख की चिठ्ठी होती है, और हर नुक्सान होने वाले फायदे का इशारा. – देवदास
दर्द की दवा न हो, तो दर्द को ही दवा समझ लेना चाहिए…
ज़रा सी वक़्त ने करवट क्या ली, गैरों की लाइन में सबसे आगे अपनों को पाया हमने!
जिसका दिल ग़म की तन्हाइयों में उजड़ गया हो, वो बाहर से कितना ही सेहतमंद लगता हो, लेकिन अंदर से तो बीमार ही रहता है
प्यार हम दोनों ने किया, मगर तड़पना सिर्फ मेरे नसीब में आया