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जब इंसान अन्दर से टूटता है तो बहार से खामोश हो जाता
कभी-कभी हम किसी के लिए उतना भी ज़रूरी नहीं होते, जितना की हम सोचते
आज तो हम ख़ूब रुलायेंगे उन्हें, सुना है उसे रोते हुए लिपट जाने की आदत
मनुष्य कितना भी गोरा क्यों ना हो परंतु उसकी परछाई सदैव काली होती है…!! “मैं श्रेष्ठ हूँ” यह आत्मविश्वास है लेकिन…. “सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ हूँ” यह अहंकार है
किसी को इतना भी ना चाहो कि फिर भुला ही ना
रोज रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ा हूँ, ए मुश्किलों देखो मैं तुमसे कितना बड़ा
कितना अजीब भ्रम है ये मानना कि सुन्दरता
जब इंसान तन्हा चलना सीख जाता है तब वो दुनिया को समझ चुका
कोई किसी का नहीं होता दुनिया में, जब दिल भर जाता है तो लोग याद करना भी छोड़ देते
चलो अब जाने भी दो क्या करोगे दास्ताँ सुनकर, ख़ामोशी तुम समझोगे नहीं और बयाँ हमसे होगा