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जब इंसान अन्दर से टूटता है तो बहार से खामोश हो जाता
हकीकत कुछ और ही होती है, हर गुमसुम इन्सान पागल नहीं
किसी को इतना भी ना चाहो कि फिर भुला ही ना
अगर सजा दे ही चुके हो तो हाल न पूछना, हम अगर बेगुनाह निकले तो तुम्हे अफ़सोस
रोज रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ा हूँ, ए मुश्किलों देखो मैं तुमसे कितना बड़ा
मनुष्य कितना भी गोरा क्यों ना हो परंतु उसकी परछाई सदैव काली होती है…!! “मैं श्रेष्ठ हूँ” यह आत्मविश्वास है लेकिन…. “सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ हूँ” यह अहंकार है
इंसान अपनी कमाई के हिसाब से नहीं, अपनी ज़रूरत के हिसाब से गरीब होता
कितना अजीब है लोगों का अंदाज-ऐ-मोहब्बत, रोज एक नया जख्म देकर कहते हैं अपना ख्याल रखना
अकेले रहने में और अकेले हो जाने में बहुत फर्क होता
दुश्मन से ज्यादा खतरनाक वो है, जो दोस्त बनकर धोका देते