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अक़्ल कहती है दोबारा आज़माना जहल है दिल ये कहता है फ़रेब-ए-दोस्त खाते जाइए
संभल कर चल नादान ये इंसानों की बस्ती है, ये खुदा को भी आजमा लेते है, फिर तेरी क्या हस्ती है..!!!
मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे
पत्थर तो हज़ारों ने मारे थे मुझे लेकिन जो दिल पे लगा आ कर इक दोस्त ने मारा है
आज खुदा ने मुझसे कहा भुला क्यों नहीं देते उसे मैंने कहा इतनी फिक्र है तो मिला क्यों नहीं देते !
ये शिकायत नहीं तजुर्बा हैं ज़नाब की, क़द्र करने वालो की कोई क़द्र नहीं होती!
हटाए थे जो राह से दोस्तों की वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं
दोस्ती जब किसी से की जाए दुश्मनों की भी राय ली जाए
दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से
खुदा भी काफी महान है, ज़िंदगी मे सिर्फ खुदा है, और खुदा ही मेरा पूरा जहां है।