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मैं ज़िन्दगी से नहीं, अपने आप से नाराज़ हूँ – अर्जुन
स्टेशन जैसी हो गयी है ज़िन्दगी, जहां लोग तो बहुत है, पर अपना कोई नह।
ज़िन्दगी एक ढलती शाम की तरह है, जिसमें कहीं उथल-पुथल है, तो कहीं थोड़ा आराम भी
ज़िन्दगी एक ढलती शाम की तरह है, जिसमें कहीं उथल-पुथल है, तो कहीं थोड़ा आराम भी।
लेकिन नकारात्मकता के साथ खड़े होने पर, ज़िन्दगी भर गलत ही गलत होगा।
जिन्दगी जिन्हें ख़ुशी नहीं देती, उन्हें तजुर्बे बहुत देती है !
लगातार चलने का नाम ज़िन्दगी है, रुकने-थकने या हार जाने का नहीं। सोने से तो बस नींद पूरा होती है सपनों को पूरा करने के लिए तो जागना पड़ता है।
ना कोई तरंग है, ना कोई उमंग है, मेरी ज़िन्दगी भी क्या एक कटी पतंग है
हद से ज्यादा खुशी और हद से ज्यादा गम, कभी किसी को मत बताओ क्योंकि ज़िन्दगी में लोग हद से ज्यादा खुशी पर नजर और हद से ज्यादा गम पर नमक जरूर लगाते है।
जितना_मैंने सोचा था ज़िन्दगी उससे कहीं_छोटी है !