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मैं इश्क लिखूं और उसे हो जाए काश मेरी शायरी में कोई ऐसे खो जाए

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तुम बस काबिल हो बस मेरी नफरत के।
दुनिया को नफरत का सुबूत नहीं देना पड़ता,
तुम से जो मोहबत थी ना,
तुम नफरत का धरना
ज़िन्दगी भर नहीं दूंगा।
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
इससे ज्यादा इश्क का सबूत और क्या दूं साहब मैंने उसके जिस्म को नहीं उसकी रूह को चुना है
समझ नहीं आता किस पर भरोसा करू,
तेरी एक मुस्कान से सुधर गयी तबियत मेरी, बताओ यार इश्क करते हो या इलाज करते हो!
छुपा रहा हूं इश्क अभी सबसे पर एक दिन सरेआम तुम्हें लेने आऊंगा