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दोस्त दो-चार निकलते हैं कहीं लाखों में जितने होते हैं सिवा उतने ही कम होते
कामयाबी ना मिलने पर कभी हारा नहीं करते! बस अपनी गलतियों को सुधार कर मेहनत को सही दिशा देते रहते हैं।
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार
यहाँ तो लोग नफरत भी करते है प्यार की तरह।
दोस्ती ख़्वाब है और ख़्वाब की ता’बीर भी है रिश्ता-ए-इश्क़ भी है याद की ज़ंजीर भी
अक़्ल कहती है दोबारा आज़माना जहल है दिल ये कहता है फ़रेब-ए-दोस्त खाते
जीतने वाले अलग चीजें नहीं करते, वो चीजों को अलग तरह से करते हैं
भूल शायद बहुत बड़ी कर ली दिल ने दुनिया से दोस्ती कर
जो लोग खुद से प्यार करते हैं, वो दूसरों के दिल पर वार नहीं करते हैं !
भगवान सिर्फ उन्ही की सहायता करता है जो लोग खुद अपनी सहायता स्वयं करते