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मैं ज़िन्दगी से नहीं, अपने आप से नाराज़ हूँ – अर्जुन
मंजिल दूर और सफर बहुत है, छोटी सी जिंदगी की फिक्र बहुत है,
लोगों के साम्राज्य में अपने साहस की राजधानी बसा लो।
इस दिन हर कोई अपने पिता को स्पेशल फील करवाना चाहता
कभी तो चौक के देखे कोई इंसान तरफ, किसी की आंख में हमको भी इंतजार दिखे ।
हमेशा अपने विचारों शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखें।
पापा के लिए दो लाइन
एक भाई पिता-माता का भी रोल अदा करता है।
अपने लक्ष्य को पाने के लिए जितनी मेहनत करेंगे, उतनी ही बड़ी सफलता
हमेशा अपने विचारों को शुद्ध करने का लक्ष्य रखें और सब कुछ ठीक हो जाएगा। (महात्मा गांधी)