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जमाने में वही लोग हम पर उंगली उठाते हैं जिनकी हमें छूने की औकात नहीं

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अगर ख्वाईश कुछ अलग करने की है तो दिल और दिमाग के बीच बगावत लाजमी
असंभव शब्द का प्रयोग केवल कायर ही करते हैं
तरक्कियों की दौड़ में उसी का जोर चल गया
मिसाल क़ायम करने के लिए
जब रास्तों पर चलते चलते मंजिल का ख्याल ना आये तो आप सही रास्ते
घायल तो यहां हर परिंदा है
कामयाब होने के लिए अकेले ही आगे बढ़ना पड़ता है
ज़माने लगते है सुबह होने में, जिन्हें रात को नींद नहीं आती I
खुद की तरक्की में इतना वक़्त लगा दो
गुजर जाएगा ये दौर भी ज़रा सा सब्र तो रख, जब खुशियों ही नहीं रुकी तो गम की क्या औकात है