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झूठ और दिखावे की रफ्तार कितनी भी तेज हो, पर मंजिल तक केवल सच ही पहुँचता है

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सोचने से कहाँ मिलते है तमन्नाओ के शहर, चलना भी जरुरी है मंजिल पाने के
मन में बातो के चलते रहने से ज़िंदगी रुक ही जाती
जो लोग ठोकर खाकर भी चलते रहते हैं, वही एक दिन मंजिल पाते हैं।
सीढ़ियाँ सिर्फ उनके लिए बनी हैं जिन्हें छत पर जाना है, जिनकी मंज़िल आसमान हो उनको तो रास्ता ख़ुद बनाना पड़ता है!
शब्द ही इंसान का आइना होते हैं, शक्ल तो उम्र और समय के साथ बदल
मैले कपडे फिर भी चल जाएंगे मगर मैला मन लंगड़ा
सबकी नकल की जा सकती है, लेकिन चरित्र, व्यवहार, संस्कार और ज्ञान की नकल नहीं हो सकती
सच को तो तमीज़ ही नहीं बात करने की, झूठ को देखो कितना मीठा बोलता है!
मेरी मंजिल मेरा हौंसला देख कर
बस अपने मन को मजबूत रखिये ज़िंदगी खुद-ब-खुद हलकी