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अपनी पीठ से निकले खंजरों को जब गिना मैंने, ठीक उतने ही निकले जितनो को गले लगाया था मैंने
कोई सिखादे मुझे भी अपने वादों से मुक़र जाना ! बहुत थक चुका हूँ निभाते-निभाते.
यूँ सिमट गया मेरा प्यार चंद अल्फाज़ो में ! जब उसने कहा मोहब्बत तो है पर तुमसे नहीं.
जो उम्मीद दूसरों से करते हो वो खुद से करो और ज़िन्दगी की नई शुरुआत करो।
इन फासलों के पीछे सब फैसले तुम्हारे थे.
कौन क्या सोचता है, इसकी परवाह आप न कीजिए। लोगों की सोच पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है। চিন্তা মানুষ নিয়ন্ত্রণ
जितना_मैंने सोचा था ज़िन्दगी उससे कहीं_छोटी है !
हर नया दिन एक नई उम्मीद लेकर आता है, उसे गले लगाएं और आगे बढ़ें।
अभी धूप निकलने के बाद भी जो सोया है ! वो ज़रूर तेरी याद में रातभर रोया है.
मुस्कुराते हुए इंसान की कभी जेबे देखना ! हो सकता है रूमाल गिला मिले.