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मनुष्य कितना भी गोरा क्यों ना हो परंतु उसकी परछाई सदैव काली होती है…!! “मैं श्रेष्ठ हूँ” यह आत्मविश्वास है लेकिन…. “सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ हूँ” यह अहंकार है
ठुकरा दिया जिन्होंने मुझे मेरे वक्त को लेकर ऐसा वक्त लाऊंगा की मिलेंगे मुझसे वो लोग थोड़ा वक्त लेकर।
आजाद रहिए विचारों से लेकिन बंधे रहिये संस्कारों से।
वक्त से लड़कर जो नसीब बदल दे, इंसान वही जो अपनी तक़दीर बदल दे
वक़्त सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिये। पर जिंदगी दोबारा नहीं मिलती वक़्त बदलने के लिये।
हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था, मेरी किश्ती थी डूबी वहां, जहाँ पानी कम था…
चलते वक्त के साथ तु भी चल उसमें सिमटने की कोशिश न कर
वक़्त के साए में छुपी है जिंदगी की राह, खुदा की ख़फ़ा आँखों में बस गया है इक दर्द का जहर!
मैने अपनी परछाई से पूछा तुम मेरे साथ क्यों चलती हो, परछाई ने मुस्कुरा कर बोला अरे पागल मेरे सिवा तेरा है ही कौन
ताश का जोकर, और अपनों की ठोकर, अक्सर वाजी पलट देते है।