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ईश्वर से कोई भी प्रेम कर सकता है क्योंकि वह आपसे कुछ नहीं मांगता। पर अपने पास खड़े व्यक्ति से प्रेम करने की कीमत जीवन से चुकानी पड़ती है ।

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प्रेम एक समाहित करने की प्रक्रिया है। जब एक बार आपको मैं अपने एक अंश के रूप में शामिल कर लेता हूं, मैं आपके साथ वैसा ही होऊंगा, जैसा मैं खुद के साथ हूं। - सद्‌गुरु
तर्क से परे एक आयाम है। जब तक आप वहां नहीं पहुंच जाते, आप ना तो प्रेम की मधुरता, ना ही ईश्वर को जान पाएंगे ।
हर किसी से महत्व पाने की इच्छा व्यक्ति को “नुकसान” पहुंचाती है.
जिस व्यक्ति ने कभी गलती नहीं कि उसने क भी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की
बजते हैं ढोल तो करते हैं बल्ले बल्ले आई लव यू मेरे प्यारे से रसगुल्ले..
ख़ुशी, शांति और प्रेम – ये कोई आध्यात्मिक लक्ष्य नहीं हैं। यह सब तो समझदारीपूर्वक जीने की शुरुआत है ।
मेरी जान मेरी दुआ है मुझे हर जन्म में तुमसे ही मोहब्बत हो..
जिन लोगों को प्यार नहीं मिलता, सिर्फ वो ही ऐसी कल्पना करते हैं कि ईश्वर प्रेम है। प्यार तो एक मानवीय भावना है।
प्रेम कोई काम नहीं बल्कि एक गुण है ।
अपने प्रेम, अपनी खुशी और अपने उल्लास को रोककर मत रखें। आप जो देते हैं, वही आपका गुण बन जाता है, न कि वह जो आप रोक कर रखते हैं ।