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जब आप प्रेम में पड़ते हैं, तब आपके सोचने और महसूस करने के तरीके, आपकी पसंद और नापसंद, आपकी फिलॉस्‍फी और विचारधाराएं सब कुछ पिघल जाता है।

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ज्यादातर लोगों के लिए, प्रेम का मतलब होता है, ‘तुम्हें वही करना चाहिए, जो मैं चाहता हूं।’ नहीं, प्रेम का असली मतलब है कि वे जो चाहें कर सकते हैं, और हम फिर भी उन्हें प्रेम करते हैं।
ईश्वर या कोई और आपसे प्यार करता है या नहीं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपका स्वयं का प्रेमपूर्ण होना ही आपके जीवन को सुखद व मीठा बनाता है।
जो इंसान सही और गलत, पसंद और नापसंद के दायरे में ही फंसा हुआ है, वह प्रेम के तानेबाने को कभी नहीं जान पाएगा।
स्वयं के प्रति ईमानदार होना आत्म-सम्मान का सर्वोच्च रूप है। यदि आप कुछ महसूस नहीं कर रहे हैं, तो इसे न करें।
वाइफ की तरह ख्याल रखने वाला हमेशा टाइम पास वालो से हार जाता है.
तर्क से परे भी एक जगह है। जब तक आप वहां नहीं पहुंचते, आप न तो प्रेम की मिठास को जान पाएंगे और न ही ईश्वर को।
अपने प्यार को बड़ा बनाइये। केवल एक ही व्यक्ति से प्यार क्यों करें, जब आप सारे ब्रह्मांड के साथ प्यार कर सकते हैं?
प्यार के लिये कोई बीमा नहीं होता, कोई गारंटी नहीं होती। इसे जीवित रखने के लिये जागरूकता चाहिये।
आप प्रेम में ऊंचे नहीं उठ सकते, आप प्रेम में उड़ नहीं सकते, आप प्रेम में खड़े नहीं हो सकते – आपको लव (प्रेम) में फॉल करना (गिरना) होगा। अगर आप भावनाओं के जादू को जानना चाहते हैं, तो आपके कुछ अंश को फॉल करना (गिरना) होगा।
जो लोग अपने दिमाग के कचरे को एक किनारे रख देते हैं, सिर्फ वे ही करुणा और प्रेम करने के वाकई काबिल होते हैं।