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हम हार गए क्योंकि हमने खुद से कहा कि हम हार गए.
ना कोई तरंग है, ना कोई उमंग है, मेरी ज़िन्दगी भी क्या एक कटी पतंग है
जिंदगी उस अजनबी मोड़ पर ले आई है, तुम चुप हो मुझसे और मैं चुप हूँ सबसे!
मैं ज़िन्दगी से नहीं, अपने आप से नाराज़ हूँ – अर्जुन
कितने अजीब हैं ये जमाने के लोग, खिलौना छोड़ कर जज़बातों से खेलते है।
भाई तू अच्छाई का प्रतीक है, भाई तू ही मेरे सबसे नजदीक है।
कितना अजीब भ्रम है ये मानना कि सुन्दरता
हसने वालो के साथ तो दुनिया हसती है, लेकिन रोने वाला अकेले ही रोता है…
बड़ी अजीब होती है ये यादें, कभी हसा देती है, कभी रुला देती है
जिंदगी कैसे अजीब हो गई हैं, खुश दिखना खुश होने से ज्यादा जरुरी हो गया हैं.